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INDIA

रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

दुखालय

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  बुद्ध जगत को दुखालय कहते हैं , पर यह किसके लिए दुखालय  है सिद्धार्थ  के लिए या बुद्ध  के लिए, जबतक  बुद्ध  सिद्धार्थ  थे तब तक वे सुखसागर मे विराजमान  थे कोई  दुख उनतक  पहुंच ही न पाई वो तो संयोग मात्र था कि कुछ  घटनाओ ने सिद्धार्थ को बुद्ध होने के पथ पर अग्रसर कर दिया । इन घटनाओ ने सिद्धार्थ  पर ऐसा असर किया  मानों लाखो लाखो तूफान मन से टकराया हो पूरी मान्यता और संसार के प्रति बनाई  गई समझ की महल टूट कर चकनाचूर  हो गया और फिर शुरू हुआ  हृदय के भीतर एक गहरा समुद्रमंथन इस मंथन मे जो विष निकला वह था "चार आर्य सत्य" जिसका प्रथम आर्य सत्य ही इस जगत को दुखालय होने की घोषणा करता है और जो अमृत निकला वह है "अष्टांगिक मार्ग " जैसे हिन्दू गंगा में जाकर अपने सारे पापों का प्रायश्चित करता है यह अष्टांगिक मार्ग उसी पापनाशिनी गंगा तक पहुंचने का मार्ग है जो इस मार्ग से पहुंचेगा वो गंगा की निरा प्रवाह को देख पायेगा उसकी ममता को समझ पायेगा इस मार्ग की कंटक मनुष्य  के सारे पाप को मार्ग  में ही जकड़कर नष्ट  कर...

मेरी नैना

 ये साल भी बीत गया नैना! नैना तुम मेरी कल्पनाओं की सच्ची साथी हो तुमने मेरा हमेशा साथ दिया।मै जानता हूँ नैना! तुम पूछना चाहती हो कि कैसा बीता ये साल ? अब क्या छुपाऊं तुमसे सबकुछ तो जानती हो फिर भी तुम मेरे मुख से सुनना चाहती तो सुनो- साल 2022 में मैने पाया अपनी रोजी-रोटी एक प्यारा सा नौकरी,सुबह आफिस जाओ और शाम लौट आओ इतना ही खास रहा दुनिया के लिए पर मैं तुमको कुछ और बताना चाहता हूँ, नैना! जो बात तुमसे अरसे छिपाये रखा वो बात आज तुम्हें बताने का दिल कर रहा है तो बात ये है कि इस साल मैंने एक तस्वीर बनाने कि कोशिश की थी पर मुकम्मल न हो सकी शायद इसीलिए अब तक तुमसे भी बात छिपाये रखा तुम तो जानती हो मैं संघर्षों पर सहानुभूति बटोरने का काम नही करता,असफलता का भौंडा प्रदर्शन मुझे अच्छा नहीं लगता। हाँ मेरी प्यारी नैना मैं समझ गया तुम पूछ रही हो कौन सा तस्वीर? तस्वीर नैना!तस्वीर! एक ऐसी तस्वीर जिसे वर्षों अपने दिल में संवारा था,जिसके साथ जिंदगी के सफर में निकलना चाहता,जो मेरे दिल की मर्ज थी,जिसके साथ शिकारा में बैठ गंगा में दूर तक सैर करना चाहता था,जो आज भी मेरे स्मृति के कैनवास ...

तट का नदि प्रेम

तुम नदि हो और मैं तुम्हारा किनारा मैं तुम्हें निर्झर बहते देखना चाहता हूँ और इसलिए खुद कट जाने का परवाह नहीं करता मैं कभी तुम्हारे रास्ते पर न था फिर भी तुम मुझे काटती रही और मैं मौन कटता रहा बिना किसी प्रश्न किये।कतरा कतरा कट जाने का दर्द सहता रहा बिना आह किये क्या इतना मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम का परिचय पर्याप्त नहीं।      जब इससे भी तुम्हारा मन नहीं भरता तो तुम मुझे सागर के किनारे तलहटी में छोड़ कर सागर की उच्छृंखल लहरों में लिप्त हो जाती हो मैं तट पर तुम्हारा अनवरत इंतजार करने को भी राजी हो जाता हूँ क्या यह भी पर्याप्त नहीं।     जब वर्षों इंतजार के बाद भी तुम्हारा कोई खबर नहीं मिलती तो मेरा टूट जाना स्वाभाविक है न और बस फिर उसी सागर में टूट टूट बिखर जाता हूँ फिर भी मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ न ही इसे तुम मेरी शिकायत समझना क्योंकि मैंने ही तेरी निर्झरता से प्रेम किया इसी में प्रकृति की भलाई थी यदि मैं अपने स्वार्थ के लिए तुम्हे बांध लेता तो तुम न सागर तक जा पाती न फिर घटाएँ चढ़ती और न फिर तुम जीवित होती बस तुम्हे हमेशा जीवित देखने की लालसा ही मुझे तुम्हारे अनव...

महाभारत- युद्ध और सत्य

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 मानव सभ्यता का इतिहास युद्धों का इतिहास है।अनेक युद्ध लड़े गए और सत्ता पर लोग काबीज होते गए समय बदला युद्ध के तरीके बदले परंतु युद्ध का कारण नहीं बदला, वह आज भी सत्ता और प्रभाव का कारक बना हुआ है। वर्तमान में जब इतिहास के इन युद्धों के दूरगामी परिणाम का अध्ययन करते हैं तो शिवाय विभीषिका के कुछ भी ठोस परिणाम नजर नहीं आता, इन युद्धों से कई देश बने और नष्ट हुए लेकिन मानवता पर हमेशा ऐसे युद्ध भारी ही पड़े हैं। भारत में महाभारत युद्ध की कथा जन-जन में धर्म युद्ध के रूप में विख्यात है। स्वयं कृष्ण इस युद्ध के साक्षी बने, विषाद ग्रस्त अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार किया तथा विजय हेतु पूरी रणनीति बनाई इस युद्ध का प्रचार धर्म युद्ध के भांति की जाती है, कहा जाता है कि कृष्ण ने इस युद्ध की भूमिका रची ताकि अधर्म को पराजित कर धर्म की स्थापना की जा सके। युद्ध के घटनाक्रम तो सबको पता है कि किस तरह इस युद्ध में महावीरों को कायरों की भांति अधर्म और अनीति से हताहत किया गया चाहे वह वीर अभिमन्यु हो या वीर द्रोणाचार्य दोनों ही पक्षों ने मर्यादा को तार-तार किया। युद्ध में केवल विजय का लक्ष्य लेकर साम-दा...

किसी का जाना

किसी का जाना उसी का जाना नही होता, एक मांग का सिंदूर चला जाता है, खेती का मजदूर चला जाता है। बेटी का गांव चला जाता है, बेटे का छांव चला जाता है। एक घर की कमाई चली जाती है, माँ की दवाई चली जाती है। एक पिता का सहारा चला जाता है, एक भाई का किनारा चला जाता है। परिवार की हिम्मत चली जाती है, औलाद की किस्मत चली जाती है। दिवाली स्याह और होली बेरंग हो जाती है, एक घर बिखर जाता है, मकाँ सूनी हो जाती है। फिर जो भी मिले वो पाना पाना नही होता, किसी का जाना उसी का जाना नही होता।।                              ✍ धीवेंन्द्र 'तरूण'

सुमित्रा की डायरी

 उसके जाने के बाद जिंदगी सूखे कुँए के जगती सा हो गया था, नियति की सीढ़ी लगाए सूरज रोज चढ़ता और उतर जाता मेरी बेजार निगाहें उसकी रोज पीछा करतीं जिस मुहाने से इंतजार शुरू होता उसी मुहाने पर आकर खत्म हो जातीं, यूं ही कुछ दिन चलता रहा एक रोज अचानक टेलीफोन बज उठा मैं लपका और घंटी बंद हो गई मैं वहीं कुर्सी लगाकर बैठ गया और अखबार उलटने पलटने लगा कुछ समय बाद फिर घंटी बजी मैंने रिसीव किया सामने से एक मृदुल आवाज आयी जी, चंद्रभान जी से बात हो पायेगी, मैंने कहा कहिए क्या बात है मैं ही चंद्रभान हूं।आवाज मुझे जानी पहचानी सी लग रही थी पर वक्त का तकाजा कुछ स्पष्टता की कमी थी सामने से आवाज आई मैं निरूनिमा! निरूरिमा? कौन निरूनिमा? उसने कहा निरूनिमा, सुमित्रा की बहन, सुमित्रा का नाम सुनते ही पूरे बदन में बिजली दौड़ गयी मुझे अपने बचपन के दोस्तों में सिर्फ यह एक नाम ही याद रह गया था और इसी नाम के सहारे मैंने अपनी सारी जिंदगी गुजारी थी वह हमेशा मेरे मन में उमड़ती घुमड़ती रहती थी। हमने साथ-साथ स्कूल से ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की थी फिर मुझे रिसर्च के लिए विदेश जाना पड़ा, 3 साल बाद जब वतन लौटे तब तक वह मां बन ...

मुक्तिमार्ग

 ॠषभ आज सुबह सुबह कुछ कराहते हुए नींद से जागा , आज उसकी तबियत में कुछ ज्यादा ही गिरावट आई थी।कुछ देर बिस्तर में पैर चप्पल में अंदर बाहर करते हुए सामने दीवार पर लगी पुराने फोटोग्राफ पर नजरें टिकाये हुए बैठा रहा,भावशून्य होकर एकटक निहारता रहा फिर कुछ हिम्मत जुटा कर खड़ा हुआ और बरामदे में आ गया,ड्योढ़ी से उतरकर आंगन में कुँए के पास जाकर आंख मुँह धोया और फिर अपने बिस्तर में लेट गया,दोनों हाथ एक के उपर एक अपने माथे पर रखकर किसी गहरी सोंच में डूब गया।ॠषभ एक होनहार अधेड़ उम्र का अविवाहित लड़का था हर प्रकार से अव्वल पर वक्त की ठगी ने उसे बिस्तर पर ला पटका था।कुछ दिन से उसे फेफड़ों से संबंधित समस्याएं आने लगी थी जांच से पता चला की उसे फेफड़ों का कैंसर है और वो भी अंतिम स्टेज में उसके पास गिनती के दिन शेष रह गये थे,माता पिता पहले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके थे,चाचा ने पाल पोष कर बड़ा किया था, ॠषभ अपनी अंतिम दिनों में अपने चाचा के पास आ गया था जो भी समय बचा था उसे वे अपने गांव में गुजारना चाहता था।वो दिन भी बड़ा भयानक था, हर वक्त मौत का साया और जिंदगी का सरूर उसे बार बार अतीत के पन्ने में धके...

दिया अमावश का

 अतीत तब और भारी हो जाता है जब वर्तमान पर अमावश गहराती है।जीवन को लेकर हमारी संकीर्णता हमे हमारे ही बनाये भ्रमजाल में फंसा देती है।एक क्षण रूककर सोंचिये कि हम सब इस वक्त जो कुछ कर रहे हैं उसका सारा दारोमदार भविष्य के उज्जवलता की चाहत है पर कोई नही कहता कि वो दिन कब आयेगा,आज भी तो किसी कल का ही परिणाम है किसी बीते हुए कल की भविष्य है तो फिर आज हम खुश क्यों नही हैं ?आखिर ये आज भी तो कल के भविष्य को सुधारने के प्रकल्प से ही उत्पन्न हुआ है पर जीवन में सुख का एक तिनका भी दिखाई नही पड़ता,दूर दूर तक अंधेरा ही अंंधेरा है रोशनी का एक किरण तक नही दिखता इस गहरे श्याह की अंत भी नजर नही आती मानो अब शुक्ल भी अमावश में उतर आयी है कभी कभी यह भी लगता है कि आत्मा का टिमटिमाता दिया इसी अमावश में झोंक दूं और अंत कर दूँ रोशनी की तलाश, तिरोहित कर दूँ अपने अस्तित्व की परछाई को और मिटा दूं जीवन के सारे सबूत, जो शाश्वत था है और रहेगा वो अंधकार था भला इसे कोई कैसे मिटा सकता है? क्या कभी मिटा है? जवाब है नही! तो क्या मानव जाति की संपूर्ण आस्था और उसकी मान्यताएं तथा उसके ईश्वरीय आलोक सब झूठे है? या तो यही सत्...

*चीन पर शिखर वार्ता*

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India vs China आज फिर सुबह-सुबह बलवान चचा दातुन चबाते खिसिया रहे थे, जड़ों तक हिल चुके दांतो के ढुलमुल पोलों से रिसते मचलते लार को अपनी एक बांह से लपेटते हुए ,दूसरे हाथ से अपनी बची खुची लूंगी संभालते हुए, अंगुली में लोटा चीपे बैलेंस बनाते हुए क्रांतिकारी मुद्रा में खड़े होकर मुंशीपार्टी के बिना टोंटी वाली नल से निर्बाध झरती मटमैले जल के करतल ध्वनि से राग मिलाकर ज्यों भड़के कि क्या बताऊं! क्षणभर में मोहल्ले के सारे निखट्टू निपट आवारापन के क्रम तोड़ते हुए  भावी घटित दृश्य की साक्षी बनने हेतु इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए । चाचा ने चाइनीस तवे से गर्मी भांपकर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए जर्जर हो चुके कृशकाया से एड़ी चोटी की बल लगा दी। नल से लगी सरकारी सुलभ शौचालय की उखड़ती प्लास्टर पर लाल दंतमंजन की पिक उड़ेल दिया और लो पल भर में चीन का नक्शा तैयार।अब चचा दातुन को फौजी डंडा बनाकर फौज के मूछों वाले कर्नल के भांति सीमा विवाद पर विश्लेषण के मुद्रा में आ चुके थे कि तभी भगवंती की चीख निकल पड़ी यह क्या! चाचा ने अपनी पड़ोसन भगवंती के आदमी नौलक्खा के मच्छरदानी सरीखे बनियान जो दो-तीन दिन पहले चो...

प्रकृति

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nature झूमती हुई तितलियाँ, गाते हुए भौंरे और पत्ते डाल-डाल है ये प्रकृति का काया कल्प, कल्पना विशाल है, झील, झरना,सागर बहती , पर्वत घाटी भूगोल की, रात-दिन और चांद-सितारा यह खेल है खगोल की, शांतक्लांत सुंदर वरण,पक्षियों की बोल है,  आदि अंत जीव की , प्रकृति की मोल है ,  यहां जीव-जीव जुड़ रहे ,जीवन की जाल है,  यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। nature सोना ,चांदी ,हीरे ,मोती गर्भ में खदान है , मिल गई अनमोल ये इंसान को वरदान है, रंग-रूप , रोग , दुःख का प्रकृति निदान है, परिपूर्ण है प्रकृति यह विधि का विधान है , कलकल बहती जल, यह प्रकृति की ताल है, यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। आसमान में पंछियाँ,जंगल में जीव विहार है, फूलों की हर कलियों में ,आई नित बहार है , आसमान को पर्वत छूती,खुशियों का त्यौहार है, जीवन के हर रंग-रूप में , प्रकृति ही सार है , नित्य-निरंतर चंचलता,यह प्रकृति की हाल है, यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। Add caption नित्य दोहन कर रहा, इंसान का एक वर्ग है, घट रही उपस्थिति, यह प्रकृ...

मानवीय संवेदना का छिछलापन

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"वन नष्ट होते हैं तो जल नष्ट होती है, पशु नष्ट होते हैं तो उर्वरता विदा लेती है और तब यह पुराने प्रेत एक के पीछे एक प्रकट होने लगता है- बाढ़, सूखा ,आग ,अकाल और महामारी।"  उक्त वचन स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक रॉबर्ट चेंबर्स की है। आज धरती की हालत का यथार्थ बोध दशकों पुरानी कथन से हो रही है ऐसे में इस कथन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह  थोथी शब्दजाल नही है अपितु चेम्बर्स की प्रकृति के प्रति अनन्य प्रेम और उससे उपजे प्रगाढ़ संबंधों की अभिव्यक्ति भी है तभी उन्होंने धरती की वेदना को पहचानने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है ।  आज का मानव औद्योगिक समाज का आर्थिक मानव है वह लाभ हानि के भयंकर ऊहापोह से ग्रस्त है संबंधों में भी लाभ हानि का प्रतिशत देखता है ऐसे में मानवीय संवेदना का क्या काम है मगर हमारे चारों ओर कई ऐसी घटनाएं कभी-कभी घट जाती हैं और मानव संवेदना का ज्वार फूट पड़ता है क्योंकि हैं तो हम इंसान ही! लगता है संवेदना से भरा इंसान अब रुकेगा नहीं वह दुनिया उलट-पुलट कर देगा परंतु संवेदना का ज्वार शांत होते ही वह स्वयं उलट-पुलट जाता है। संवेदना के आवेश में ना जाने क्या क...

अंधेरा घना है!

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वर्ष 2020 नव वर्ष की खुमारी अभी उतरी न थी कि कोराना का विष फैल गया।पूंजीवादी समाज के विकासोन्मुखता कब होड़ में बदलकर पृथ्वी के गर्भ खोदने लग गयी पता ही नही चला और तो और कमजोर विकाशशील देशों ने भी अपनी कमजोरी से शुतुरमुर्ग की तरह आखें बंद कर इसी विकास के अंधे दौड़ में शामिल हो गये तथा संसाधनों की बेतहाशा दोहन प्रारंभ कर रही-सही कसर पुरा कर विनाश में अपनी पूर्ण सामर्थ्य से भागीदारी निभाई।जल,जंगल,वनस्पति,खनिजऔर शुद्ध हवा-पानी के बदले भला कैसा विकास,यह विकास तो घाटे का सौदा अधिक लगता है।पूंजीवाद से बनाई गयी सारी व्यवस्था चौपट हो गयी,कहने को इससे देश की विकासशक्ती जुड़ी है पर इससे बड़ा खोखला भ्रम और कुछ नही हो सकता जो महीने-दो-महीने के तालाबंदी से घुटने पर आ जाये क्या ऐसे स्त्रोतों से देश को सुरक्षित और विकसित बनाया जा सकता है।यह तो पुरी तरह पूंजीपतियों द्वारा शोषण को जारी रखने का चाल है जिसमें आज पुरा विश्व फंसा है।श्रमिकों का आज स्थिति देख लीजिए सरकारों के बड़बोलापन कैसे धराशायी हो गये हैं।बात तो हुई थी हवाई चप्पलों को हवाई यात्रा कराने की और यह नाटकीय क्रम चला भी था पर आज श्रमिकों को...

नक्सलवाद

पंडित सुंदरलाल शर्मा ने कहा था "जो भूमि उत्तर में विंध्यश्रेणी तथा नर्मदा से, दक्षिण में इंद्रावती-ब्रम्हाणी तक विस्तृत है तथा जिसके पश्चिम में वेनगंगा बहती है ,जहां गढ़ नामावाची ग्राम संज्ञा है  जहां सिंगबाजा का प्रचार है, जहां स्त्रियों का परिधान प्रायः एक वस्त्र है तथा जहां धान की खेती होती है वहीं छत्तीसगढ़ है।" छत्तीसगढ़ की ऐसी मनोरम चित्रण इस प्रांत के सामाजिक, आर्थिक एवं धनधान्य से समृद्ध राज्य को आलोकित करती है परंतु यह राज्य के गठन के पूर्व ही कई समस्याओं से ग्रस्त हो चुकी थी इनमें से एक है 'नक्सलवाद'। 1960 के दशक में बंगाल से प्रारंभ होकर 11 राज्यों तक फैल गई । ' नक्सलवाद ' साम्यवादी क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय साम्यवादी आंदोलन के उदय से प्रारंभ हुआ। यह बंगाल में दार्जिलिंग के समीप एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से प्रारंभ हुआ अतः इसे नक्सलवाद कहा जाता है । इस आंदोलन का नेतृत्व साम्यवादी नेता कानू सान्याल एवं चारू मजूमदार ने किया 1967 में उच्च वर्ग की बढ़ती शोषण व अत्याचार से कृषक एवं मजदूर वर्ग की रक्षा तथा भूमि अधिग्र...

नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (CAA)

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9 दिसंबर 2019, लोकसभा में भारत सरकार के गृहमंत्री द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक सदन में रखा गया जो 11दिसंबर को राज्यसभा से भी पारित कर दिया गया,अंततः 12दिसंबर को महामहीम राष्ट्रपति द्वारा इस विधेयक को अनुमति प्रदान कर दी गई और विधेयक, अधिनियम में तब्दील हो गया इसके साथ ही देश में इसके पक्ष-विपक्ष में गहरा विचार-विमर्श के साथ वाद-विवाद पैदा हो गया। संविधान  के प्रावधानों के साथ-साथ विभिन्न अधिनियमों में समय के साथ-साथ परिवर्तन होते रहे हैं।ऐसा नही है कि नागरिकता संशोधन विधेयक पहली बार लायी गयी हो इसके पूर्व भी 1976,1990,2003,2006 कई मौकों पर आवश्यकतानुसार तब्दीली की गई है।तब्दीली प्रक्रिया के लिहाज से यह संवैधानिक है तो फिर क्यों एक वर्ग विशेष द्वारा इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है विरोध के इन स्वरों में विधेयक के वो प्रावधान है जिसमें यह कहा गया है कि पाकिस्तान,अफगानिस्तान व बांग्लादेश के हिन्दू,सिक्ख,बौद्ध,जैन,ईसाई व पारसी शरणार्थियों को जो 31दिसंबर2014 के पूर्व भारत आये हैं नागरिकता प्रदान की जायेगी जबकि मुस्लिमों को इससे अलग रखा गया है उन्हें पूर्व के प्रावधानों के तहत प्रक्र...

प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध प्रकृति के लिए आवश्यक

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 मानवीय मेधा से निर्मित वस्तुओं के अतिरिक्त जो कुछ इस संसार में  मौजूद है जिसमें पर्वत-पठार, नदी-सागर, जल-जंगल, जीव-जंतु, ग्रह-नक्षत्र इत्यादि का समावेश है ' प्रकृति ' कहलाता है, यह स्वत: निर्मित होता है अतः इनकी समस्त परिस्थितियां प्रकृति के अनुकूल होती हैं क्योंकि मानव प्राकृतिक तो है परंतु अपनी मेधा के प्रयोग से जो कुछ वह आविष्कार करता है वह प्रकृति से परे मानव कृत कहलाता है ,जो मानव के स्वार्थ पूर्ति हेतु होता है ऐसे में कभी कभी प्रकृति और मानव कृत व्यवस्था के मध्य असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती है ,यह असंतुलन कभी-कभी बड़े संकट को जन्म देती है।  प्लास्टिक ऐसा ही एक मानवीय खोज है जो प्रारंभ में किसी वरदान से कम ना था परंतु इसके बढ़ते प्रयोग एवं अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन के कारण यह पर्यावरण के लिए गहरा संकट बन चुका है। plastics प्लास्टिक एक प्रकार का  बहुलक है जो समान या असमान एकलकों के लंबी श्रृंखलाओं से मिलकर बनता है। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड 2015-16 के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15लाख टन से अधिक प्लास्टिक प्रतिवर्ष उत्पादित होता है। प्लास्टिक आज विकास...

छत्तीसगढ़ के पर्यटन केंद्रों की राष्ट्रीय पहचान कैसे बने? ,chhattisgarh ka paryatan sthal

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मध्य भारत में स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित  छत्तीसगढ़  प्रांत अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं आर्थिक वैभव से समृद्ध राष्ट्र में अलग पहचान रखती है। पंडित सुंदरलाल शर्मा के शब्दों में "जो भूभाग उत्तर में  विध्यांचल   व नर्मदा से दक्षिण की ओर इंद्रावती व ब्रह्माणी तक है। जिसके पश्चिम में वेन गंगा बहती है ,और जहां पर गढ़ नामाबाची ग्राम संज्ञा है जहां पर सिंगबाजा का प्रचार है,जहां स्त्रियों का पहनावा प्रायः एक वस्त्र है तथा जहां धान की खेती होती है, वही भूमि छत्तीसगढ़ है।" छत्तीसगढ़ के संदर्भ में शब्दों का यह मणिकांचन प्रयोग इस धरा के सौंदर्य बोध का परिचायक है। छत्तीसगढ़ में पर्यटन की विविध संभावनाएं है ,यहां ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थलों का भरमार है। इस भूमि पर राम, गांधी और बुद्ध के पदचिह्न हैं इस पूण्य भूमि की सुंदरता देखते ही बनती है। chhattisgarh ka paryatan sthal   रायगढ़ में बोतल्दा, सिंहनपुर की गुफा पाषाण कालीन स्थल हैं। यहां अनेक शैल चित्र बिखरे हुए हैं। इसके अतिरिक्त  रामायण, महाभारत ,जैन-बौद्ध, मौर्य एव...

गधे को गंगा जल

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गधे को गंगाजल वर्षों मालिक को सेवा देने के बाद आखिर मेरा भी सेवानिवृत्ति का समय आ गया,पिछले कुछ दिनों से शारीरिक क्षमता क्षिर्ण हुई है हालात की गंभीरता को समझते हुए मालिक ने सेवा मुक्ति का आदेश जारी कर दिया है।अब तो पैर भी नही चलते हैं बची जिंदगी बैठे ही गुजारनी है सो घर के बाहर पीपल के ओट में बेर के छांव तले मेरे अंतिम आवास हेतु भूमि आबंटित हुआ है,शायद ये वहीं पांच गज जमीन है जिसका सबको इंतजार होता है।वृद्ध हो चला हूँ,चमड़ी कोमल हो गयी है आसानी से बेर के कांटे चुभ जाते हैं,तन में लहू बचा नही सो रिसता नही ,हाँ थोड़ा तकलीफ जरूर होता है पर अपने मालिक के लिए क्या इतना सह नही सकता! आखिर बिना काम लिए दो वक्त का आधा पेट सही खाना तो दे ही देता है,नक्कारा खच्चर इससे बेहतर और क्या उम्मीद पाले वैसे भी हम तो गुलाम हैं।जब लोकतंत्र में लोग भूखे सोते हैं उससे तो बेहतर हैं।जब घनघोर कंटीली छाया में करवट बदलता हूँ तो जरूर बदन पर कांटे चुभते हैं पर वो खुरों पर कील ठोकने से बेहतर है।अब तो बस चंद वक्त ही रह गये हैं न जाने कब बुलावा आ जाये मगर जो वक्त है वो तमाम उम्र की हिसाब करने बैठ गयी है और मे...

सड़कों पर बेमौत मरती गायें समाधान क्या?

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गौ ,गंगा, गायत्री ,गीता, सभी पूज्य हैं परम पुनीता। भारतवर्ष में गाय न केवल पशु है अपितु यह हमारी समृद्धि एवं समन्वित संस्कृति का अद्वितीय धरोहर है भारत में गाय को गौ माता का दर्जा प्राप्त है, साथ ही गौ सेवा, गौ पूजन एवं गौ आराधना से संबंधित अनेक तीज-त्यौहार भारतीय जनमानस एवं लोक व्यवहार में व्याप्त है। 20 वीं पशु जनगणना के आधार पर भारत में पशुधन की संख्या 300 मिलियन से भी  अधिक है जो विश्व में सर्वाधिक है साथ ही भारत दुग्ध उत्पादन में भी प्रथम स्थान पर है इस प्रकार भारत में गाय एवं गोवंश का महत्वपूर्ण आर्थिक स्थान भी है।  भारत में गोधन कृषि, परिवहन, दुग्ध  एवं मांस उत्पादन में उपयोगी रहा है गाय एक ऐसा पशु है जिसकी गोबर, मूत्र ,चर्म, अस्थि, मांस सभी उपयोगी है गाय की यह बहुआयामी उपयोगिता प्राचीन काल से चली आ रही है। ॠगवैदिक काल में गायों की महत्ता चरम पर थी तब गायों के लिए युद्ध हुआ करता था जिसे गावेष्टी कहा जाता  था गायों को मुद्रा की तरह उपयोग किया जाता था गोवंश के इस विपुल उपयोगिता के कारण ही इन्हें पशुधन  या गोधन कहा जाता है परंतु आज के औद्योगिक समा...

'नव भारत'की संकल्पना चुनौतियां और संभावनाएं

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'नव भारत' गांधी,सुभाष,सरदार पटेल,अंबेडकर,नेहरू जैसे महान् लोगों के सपनों का भारत है। निकट भविष्य में गरीबी, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, नक्सलवाद इत्यादि व्याधियों से मुक्त और एकता, अखंडता, सहिष्णुता ,समानता ,बंधुत्व, वैज्ञानिकता, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक क्षमताओं से युक्त सशक्त राष्ट्र को 'नव भारत' की संज्ञा दी गई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित एवं उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में पहचान बनाने वाली भारत अब नव सृजन के राह पर निकल पड़ा है।सन् 2014 में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नवीन भारत की नींव रखी गई जिसका मूल उद्देश्य भारत का समावेशी विकास है,इस हेतु कई महत्वपूर्ण निर्णय एवं लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं।यथा गांधी जी के 150वीं जयंती पर 'स्वच्छ भारत की संकल्पना', भारत छोड़ो आन्दोलन के 75वीं वर्षगांठ पर गरीबी,गंदगी और आतंक भारत भारत छोड़ो का नारा दिया गया, सबके लिए आवास,पेयजल,हर घर को बिजली,स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता इत्यादि सामाजिक सुविधाओं को सुनिश्चित किया गया है इसके साथ ही अधोसंरचनात्मक परिवर्तन जैसे डिजिटल इंडिया, वित्तीय समावेशन, आयुष्मान भारत निर्मा...