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INDIA

रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

सुमित्रा की डायरी

 उसके जाने के बाद जिंदगी सूखे कुँए के जगती सा हो गया था, नियति की सीढ़ी लगाए सूरज रोज चढ़ता और उतर जाता मेरी बेजार निगाहें उसकी रोज पीछा करतीं जिस मुहाने से इंतजार शुरू होता उसी मुहाने पर आकर खत्म हो जातीं, यूं ही कुछ दिन चलता रहा एक रोज अचानक टेलीफोन बज उठा मैं लपका और घंटी बंद हो गई मैं वहीं कुर्सी लगाकर बैठ गया और अखबार उलटने पलटने लगा कुछ समय बाद फिर घंटी बजी मैंने रिसीव किया सामने से एक मृदुल आवाज आयी जी, चंद्रभान जी से बात हो पायेगी, मैंने कहा कहिए क्या बात है मैं ही चंद्रभान हूं।आवाज मुझे जानी पहचानी सी लग रही थी पर वक्त का तकाजा कुछ स्पष्टता की कमी थी सामने से आवाज आई मैं निरूनिमा! निरूरिमा? कौन निरूनिमा? उसने कहा निरूनिमा, सुमित्रा की बहन, सुमित्रा का नाम सुनते ही पूरे बदन में बिजली दौड़ गयी मुझे अपने बचपन के दोस्तों में सिर्फ यह एक नाम ही याद रह गया था और इसी नाम के सहारे मैंने अपनी सारी जिंदगी गुजारी थी वह हमेशा मेरे मन में उमड़ती घुमड़ती रहती थी। हमने साथ-साथ स्कूल से ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की थी फिर मुझे रिसर्च के लिए विदेश जाना पड़ा, 3 साल बाद जब वतन लौटे तब तक वह मां बन ...

मुक्तिमार्ग

 ॠषभ आज सुबह सुबह कुछ कराहते हुए नींद से जागा , आज उसकी तबियत में कुछ ज्यादा ही गिरावट आई थी।कुछ देर बिस्तर में पैर चप्पल में अंदर बाहर करते हुए सामने दीवार पर लगी पुराने फोटोग्राफ पर नजरें टिकाये हुए बैठा रहा,भावशून्य होकर एकटक निहारता रहा फिर कुछ हिम्मत जुटा कर खड़ा हुआ और बरामदे में आ गया,ड्योढ़ी से उतरकर आंगन में कुँए के पास जाकर आंख मुँह धोया और फिर अपने बिस्तर में लेट गया,दोनों हाथ एक के उपर एक अपने माथे पर रखकर किसी गहरी सोंच में डूब गया।ॠषभ एक होनहार अधेड़ उम्र का अविवाहित लड़का था हर प्रकार से अव्वल पर वक्त की ठगी ने उसे बिस्तर पर ला पटका था।कुछ दिन से उसे फेफड़ों से संबंधित समस्याएं आने लगी थी जांच से पता चला की उसे फेफड़ों का कैंसर है और वो भी अंतिम स्टेज में उसके पास गिनती के दिन शेष रह गये थे,माता पिता पहले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके थे,चाचा ने पाल पोष कर बड़ा किया था, ॠषभ अपनी अंतिम दिनों में अपने चाचा के पास आ गया था जो भी समय बचा था उसे वे अपने गांव में गुजारना चाहता था।वो दिन भी बड़ा भयानक था, हर वक्त मौत का साया और जिंदगी का सरूर उसे बार बार अतीत के पन्ने में धके...

दिया अमावश का

 अतीत तब और भारी हो जाता है जब वर्तमान पर अमावश गहराती है।जीवन को लेकर हमारी संकीर्णता हमे हमारे ही बनाये भ्रमजाल में फंसा देती है।एक क्षण रूककर सोंचिये कि हम सब इस वक्त जो कुछ कर रहे हैं उसका सारा दारोमदार भविष्य के उज्जवलता की चाहत है पर कोई नही कहता कि वो दिन कब आयेगा,आज भी तो किसी कल का ही परिणाम है किसी बीते हुए कल की भविष्य है तो फिर आज हम खुश क्यों नही हैं ?आखिर ये आज भी तो कल के भविष्य को सुधारने के प्रकल्प से ही उत्पन्न हुआ है पर जीवन में सुख का एक तिनका भी दिखाई नही पड़ता,दूर दूर तक अंधेरा ही अंंधेरा है रोशनी का एक किरण तक नही दिखता इस गहरे श्याह की अंत भी नजर नही आती मानो अब शुक्ल भी अमावश में उतर आयी है कभी कभी यह भी लगता है कि आत्मा का टिमटिमाता दिया इसी अमावश में झोंक दूं और अंत कर दूँ रोशनी की तलाश, तिरोहित कर दूँ अपने अस्तित्व की परछाई को और मिटा दूं जीवन के सारे सबूत, जो शाश्वत था है और रहेगा वो अंधकार था भला इसे कोई कैसे मिटा सकता है? क्या कभी मिटा है? जवाब है नही! तो क्या मानव जाति की संपूर्ण आस्था और उसकी मान्यताएं तथा उसके ईश्वरीय आलोक सब झूठे है? या तो यही सत्...

*चीन पर शिखर वार्ता*

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India vs China आज फिर सुबह-सुबह बलवान चचा दातुन चबाते खिसिया रहे थे, जड़ों तक हिल चुके दांतो के ढुलमुल पोलों से रिसते मचलते लार को अपनी एक बांह से लपेटते हुए ,दूसरे हाथ से अपनी बची खुची लूंगी संभालते हुए, अंगुली में लोटा चीपे बैलेंस बनाते हुए क्रांतिकारी मुद्रा में खड़े होकर मुंशीपार्टी के बिना टोंटी वाली नल से निर्बाध झरती मटमैले जल के करतल ध्वनि से राग मिलाकर ज्यों भड़के कि क्या बताऊं! क्षणभर में मोहल्ले के सारे निखट्टू निपट आवारापन के क्रम तोड़ते हुए  भावी घटित दृश्य की साक्षी बनने हेतु इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए । चाचा ने चाइनीस तवे से गर्मी भांपकर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए जर्जर हो चुके कृशकाया से एड़ी चोटी की बल लगा दी। नल से लगी सरकारी सुलभ शौचालय की उखड़ती प्लास्टर पर लाल दंतमंजन की पिक उड़ेल दिया और लो पल भर में चीन का नक्शा तैयार।अब चचा दातुन को फौजी डंडा बनाकर फौज के मूछों वाले कर्नल के भांति सीमा विवाद पर विश्लेषण के मुद्रा में आ चुके थे कि तभी भगवंती की चीख निकल पड़ी यह क्या! चाचा ने अपनी पड़ोसन भगवंती के आदमी नौलक्खा के मच्छरदानी सरीखे बनियान जो दो-तीन दिन पहले चो...

प्रकृति

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nature झूमती हुई तितलियाँ, गाते हुए भौंरे और पत्ते डाल-डाल है ये प्रकृति का काया कल्प, कल्पना विशाल है, झील, झरना,सागर बहती , पर्वत घाटी भूगोल की, रात-दिन और चांद-सितारा यह खेल है खगोल की, शांतक्लांत सुंदर वरण,पक्षियों की बोल है,  आदि अंत जीव की , प्रकृति की मोल है ,  यहां जीव-जीव जुड़ रहे ,जीवन की जाल है,  यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। nature सोना ,चांदी ,हीरे ,मोती गर्भ में खदान है , मिल गई अनमोल ये इंसान को वरदान है, रंग-रूप , रोग , दुःख का प्रकृति निदान है, परिपूर्ण है प्रकृति यह विधि का विधान है , कलकल बहती जल, यह प्रकृति की ताल है, यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। आसमान में पंछियाँ,जंगल में जीव विहार है, फूलों की हर कलियों में ,आई नित बहार है , आसमान को पर्वत छूती,खुशियों का त्यौहार है, जीवन के हर रंग-रूप में , प्रकृति ही सार है , नित्य-निरंतर चंचलता,यह प्रकृति की हाल है, यह प्रकृति का कायाकल्प कल्पना विशाल है। Add caption नित्य दोहन कर रहा, इंसान का एक वर्ग है, घट रही उपस्थिति, यह प्रकृ...

मानवीय संवेदना का छिछलापन

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"वन नष्ट होते हैं तो जल नष्ट होती है, पशु नष्ट होते हैं तो उर्वरता विदा लेती है और तब यह पुराने प्रेत एक के पीछे एक प्रकट होने लगता है- बाढ़, सूखा ,आग ,अकाल और महामारी।"  उक्त वचन स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक रॉबर्ट चेंबर्स की है। आज धरती की हालत का यथार्थ बोध दशकों पुरानी कथन से हो रही है ऐसे में इस कथन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह  थोथी शब्दजाल नही है अपितु चेम्बर्स की प्रकृति के प्रति अनन्य प्रेम और उससे उपजे प्रगाढ़ संबंधों की अभिव्यक्ति भी है तभी उन्होंने धरती की वेदना को पहचानने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है ।  आज का मानव औद्योगिक समाज का आर्थिक मानव है वह लाभ हानि के भयंकर ऊहापोह से ग्रस्त है संबंधों में भी लाभ हानि का प्रतिशत देखता है ऐसे में मानवीय संवेदना का क्या काम है मगर हमारे चारों ओर कई ऐसी घटनाएं कभी-कभी घट जाती हैं और मानव संवेदना का ज्वार फूट पड़ता है क्योंकि हैं तो हम इंसान ही! लगता है संवेदना से भरा इंसान अब रुकेगा नहीं वह दुनिया उलट-पुलट कर देगा परंतु संवेदना का ज्वार शांत होते ही वह स्वयं उलट-पुलट जाता है। संवेदना के आवेश में ना जाने क्या क...

अंधेरा घना है!

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वर्ष 2020 नव वर्ष की खुमारी अभी उतरी न थी कि कोराना का विष फैल गया।पूंजीवादी समाज के विकासोन्मुखता कब होड़ में बदलकर पृथ्वी के गर्भ खोदने लग गयी पता ही नही चला और तो और कमजोर विकाशशील देशों ने भी अपनी कमजोरी से शुतुरमुर्ग की तरह आखें बंद कर इसी विकास के अंधे दौड़ में शामिल हो गये तथा संसाधनों की बेतहाशा दोहन प्रारंभ कर रही-सही कसर पुरा कर विनाश में अपनी पूर्ण सामर्थ्य से भागीदारी निभाई।जल,जंगल,वनस्पति,खनिजऔर शुद्ध हवा-पानी के बदले भला कैसा विकास,यह विकास तो घाटे का सौदा अधिक लगता है।पूंजीवाद से बनाई गयी सारी व्यवस्था चौपट हो गयी,कहने को इससे देश की विकासशक्ती जुड़ी है पर इससे बड़ा खोखला भ्रम और कुछ नही हो सकता जो महीने-दो-महीने के तालाबंदी से घुटने पर आ जाये क्या ऐसे स्त्रोतों से देश को सुरक्षित और विकसित बनाया जा सकता है।यह तो पुरी तरह पूंजीपतियों द्वारा शोषण को जारी रखने का चाल है जिसमें आज पुरा विश्व फंसा है।श्रमिकों का आज स्थिति देख लीजिए सरकारों के बड़बोलापन कैसे धराशायी हो गये हैं।बात तो हुई थी हवाई चप्पलों को हवाई यात्रा कराने की और यह नाटकीय क्रम चला भी था पर आज श्रमिकों को...