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INDIA

रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

मेरी नैना

 ये साल भी बीत गया नैना! नैना तुम मेरी कल्पनाओं की सच्ची साथी हो तुमने मेरा हमेशा साथ दिया।मै जानता हूँ नैना! तुम पूछना चाहती हो कि कैसा बीता ये साल ? अब क्या छुपाऊं तुमसे सबकुछ तो जानती हो फिर भी तुम मेरे मुख से सुनना चाहती तो सुनो- साल 2022 में मैने पाया अपनी रोजी-रोटी एक प्यारा सा नौकरी,सुबह आफिस जाओ और शाम लौट आओ इतना ही खास रहा दुनिया के लिए पर मैं तुमको कुछ और बताना चाहता हूँ, नैना! जो बात तुमसे अरसे छिपाये रखा वो बात आज तुम्हें बताने का दिल कर रहा है तो बात ये है कि इस साल मैंने एक तस्वीर बनाने कि कोशिश की थी पर मुकम्मल न हो सकी शायद इसीलिए अब तक तुमसे भी बात छिपाये रखा तुम तो जानती हो मैं संघर्षों पर सहानुभूति बटोरने का काम नही करता,असफलता का भौंडा प्रदर्शन मुझे अच्छा नहीं लगता। हाँ मेरी प्यारी नैना मैं समझ गया तुम पूछ रही हो कौन सा तस्वीर? तस्वीर नैना!तस्वीर! एक ऐसी तस्वीर जिसे वर्षों अपने दिल में संवारा था,जिसके साथ जिंदगी के सफर में निकलना चाहता,जो मेरे दिल की मर्ज थी,जिसके साथ शिकारा में बैठ गंगा में दूर तक सैर करना चाहता था,जो आज भी मेरे स्मृति के कैनवास ...

तट का नदि प्रेम

तुम नदि हो और मैं तुम्हारा किनारा मैं तुम्हें निर्झर बहते देखना चाहता हूँ और इसलिए खुद कट जाने का परवाह नहीं करता मैं कभी तुम्हारे रास्ते पर न था फिर भी तुम मुझे काटती रही और मैं मौन कटता रहा बिना किसी प्रश्न किये।कतरा कतरा कट जाने का दर्द सहता रहा बिना आह किये क्या इतना मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम का परिचय पर्याप्त नहीं।      जब इससे भी तुम्हारा मन नहीं भरता तो तुम मुझे सागर के किनारे तलहटी में छोड़ कर सागर की उच्छृंखल लहरों में लिप्त हो जाती हो मैं तट पर तुम्हारा अनवरत इंतजार करने को भी राजी हो जाता हूँ क्या यह भी पर्याप्त नहीं।     जब वर्षों इंतजार के बाद भी तुम्हारा कोई खबर नहीं मिलती तो मेरा टूट जाना स्वाभाविक है न और बस फिर उसी सागर में टूट टूट बिखर जाता हूँ फिर भी मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ न ही इसे तुम मेरी शिकायत समझना क्योंकि मैंने ही तेरी निर्झरता से प्रेम किया इसी में प्रकृति की भलाई थी यदि मैं अपने स्वार्थ के लिए तुम्हे बांध लेता तो तुम न सागर तक जा पाती न फिर घटाएँ चढ़ती और न फिर तुम जीवित होती बस तुम्हे हमेशा जीवित देखने की लालसा ही मुझे तुम्हारे अनव...

महाभारत- युद्ध और सत्य

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 मानव सभ्यता का इतिहास युद्धों का इतिहास है।अनेक युद्ध लड़े गए और सत्ता पर लोग काबीज होते गए समय बदला युद्ध के तरीके बदले परंतु युद्ध का कारण नहीं बदला, वह आज भी सत्ता और प्रभाव का कारक बना हुआ है। वर्तमान में जब इतिहास के इन युद्धों के दूरगामी परिणाम का अध्ययन करते हैं तो शिवाय विभीषिका के कुछ भी ठोस परिणाम नजर नहीं आता, इन युद्धों से कई देश बने और नष्ट हुए लेकिन मानवता पर हमेशा ऐसे युद्ध भारी ही पड़े हैं। भारत में महाभारत युद्ध की कथा जन-जन में धर्म युद्ध के रूप में विख्यात है। स्वयं कृष्ण इस युद्ध के साक्षी बने, विषाद ग्रस्त अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार किया तथा विजय हेतु पूरी रणनीति बनाई इस युद्ध का प्रचार धर्म युद्ध के भांति की जाती है, कहा जाता है कि कृष्ण ने इस युद्ध की भूमिका रची ताकि अधर्म को पराजित कर धर्म की स्थापना की जा सके। युद्ध के घटनाक्रम तो सबको पता है कि किस तरह इस युद्ध में महावीरों को कायरों की भांति अधर्म और अनीति से हताहत किया गया चाहे वह वीर अभिमन्यु हो या वीर द्रोणाचार्य दोनों ही पक्षों ने मर्यादा को तार-तार किया। युद्ध में केवल विजय का लक्ष्य लेकर साम-दा...

किसी का जाना

किसी का जाना उसी का जाना नही होता, एक मांग का सिंदूर चला जाता है, खेती का मजदूर चला जाता है। बेटी का गांव चला जाता है, बेटे का छांव चला जाता है। एक घर की कमाई चली जाती है, माँ की दवाई चली जाती है। एक पिता का सहारा चला जाता है, एक भाई का किनारा चला जाता है। परिवार की हिम्मत चली जाती है, औलाद की किस्मत चली जाती है। दिवाली स्याह और होली बेरंग हो जाती है, एक घर बिखर जाता है, मकाँ सूनी हो जाती है। फिर जो भी मिले वो पाना पाना नही होता, किसी का जाना उसी का जाना नही होता।।                              ✍ धीवेंन्द्र 'तरूण'

सुमित्रा की डायरी

 उसके जाने के बाद जिंदगी सूखे कुँए के जगती सा हो गया था, नियति की सीढ़ी लगाए सूरज रोज चढ़ता और उतर जाता मेरी बेजार निगाहें उसकी रोज पीछा करतीं जिस मुहाने से इंतजार शुरू होता उसी मुहाने पर आकर खत्म हो जातीं, यूं ही कुछ दिन चलता रहा एक रोज अचानक टेलीफोन बज उठा मैं लपका और घंटी बंद हो गई मैं वहीं कुर्सी लगाकर बैठ गया और अखबार उलटने पलटने लगा कुछ समय बाद फिर घंटी बजी मैंने रिसीव किया सामने से एक मृदुल आवाज आयी जी, चंद्रभान जी से बात हो पायेगी, मैंने कहा कहिए क्या बात है मैं ही चंद्रभान हूं।आवाज मुझे जानी पहचानी सी लग रही थी पर वक्त का तकाजा कुछ स्पष्टता की कमी थी सामने से आवाज आई मैं निरूनिमा! निरूरिमा? कौन निरूनिमा? उसने कहा निरूनिमा, सुमित्रा की बहन, सुमित्रा का नाम सुनते ही पूरे बदन में बिजली दौड़ गयी मुझे अपने बचपन के दोस्तों में सिर्फ यह एक नाम ही याद रह गया था और इसी नाम के सहारे मैंने अपनी सारी जिंदगी गुजारी थी वह हमेशा मेरे मन में उमड़ती घुमड़ती रहती थी। हमने साथ-साथ स्कूल से ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की थी फिर मुझे रिसर्च के लिए विदेश जाना पड़ा, 3 साल बाद जब वतन लौटे तब तक वह मां बन ...

मुक्तिमार्ग

 ॠषभ आज सुबह सुबह कुछ कराहते हुए नींद से जागा , आज उसकी तबियत में कुछ ज्यादा ही गिरावट आई थी।कुछ देर बिस्तर में पैर चप्पल में अंदर बाहर करते हुए सामने दीवार पर लगी पुराने फोटोग्राफ पर नजरें टिकाये हुए बैठा रहा,भावशून्य होकर एकटक निहारता रहा फिर कुछ हिम्मत जुटा कर खड़ा हुआ और बरामदे में आ गया,ड्योढ़ी से उतरकर आंगन में कुँए के पास जाकर आंख मुँह धोया और फिर अपने बिस्तर में लेट गया,दोनों हाथ एक के उपर एक अपने माथे पर रखकर किसी गहरी सोंच में डूब गया।ॠषभ एक होनहार अधेड़ उम्र का अविवाहित लड़का था हर प्रकार से अव्वल पर वक्त की ठगी ने उसे बिस्तर पर ला पटका था।कुछ दिन से उसे फेफड़ों से संबंधित समस्याएं आने लगी थी जांच से पता चला की उसे फेफड़ों का कैंसर है और वो भी अंतिम स्टेज में उसके पास गिनती के दिन शेष रह गये थे,माता पिता पहले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके थे,चाचा ने पाल पोष कर बड़ा किया था, ॠषभ अपनी अंतिम दिनों में अपने चाचा के पास आ गया था जो भी समय बचा था उसे वे अपने गांव में गुजारना चाहता था।वो दिन भी बड़ा भयानक था, हर वक्त मौत का साया और जिंदगी का सरूर उसे बार बार अतीत के पन्ने में धके...

दिया अमावश का

 अतीत तब और भारी हो जाता है जब वर्तमान पर अमावश गहराती है।जीवन को लेकर हमारी संकीर्णता हमे हमारे ही बनाये भ्रमजाल में फंसा देती है।एक क्षण रूककर सोंचिये कि हम सब इस वक्त जो कुछ कर रहे हैं उसका सारा दारोमदार भविष्य के उज्जवलता की चाहत है पर कोई नही कहता कि वो दिन कब आयेगा,आज भी तो किसी कल का ही परिणाम है किसी बीते हुए कल की भविष्य है तो फिर आज हम खुश क्यों नही हैं ?आखिर ये आज भी तो कल के भविष्य को सुधारने के प्रकल्प से ही उत्पन्न हुआ है पर जीवन में सुख का एक तिनका भी दिखाई नही पड़ता,दूर दूर तक अंधेरा ही अंंधेरा है रोशनी का एक किरण तक नही दिखता इस गहरे श्याह की अंत भी नजर नही आती मानो अब शुक्ल भी अमावश में उतर आयी है कभी कभी यह भी लगता है कि आत्मा का टिमटिमाता दिया इसी अमावश में झोंक दूं और अंत कर दूँ रोशनी की तलाश, तिरोहित कर दूँ अपने अस्तित्व की परछाई को और मिटा दूं जीवन के सारे सबूत, जो शाश्वत था है और रहेगा वो अंधकार था भला इसे कोई कैसे मिटा सकता है? क्या कभी मिटा है? जवाब है नही! तो क्या मानव जाति की संपूर्ण आस्था और उसकी मान्यताएं तथा उसके ईश्वरीय आलोक सब झूठे है? या तो यही सत्...