रज़ा
तुम नदि हो और मैं तुम्हारा किनारा मैं तुम्हें निर्झर बहते देखना चाहता हूँ और इसलिए खुद कट जाने का परवाह नहीं करता मैं कभी तुम्हारे रास्ते पर न था फिर भी तुम मुझे काटती रही और मैं मौन कटता रहा बिना किसी प्रश्न किये।कतरा कतरा कट जाने का दर्द सहता रहा बिना आह किये क्या इतना मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम का परिचय पर्याप्त नहीं।
जब इससे भी तुम्हारा मन नहीं भरता तो तुम मुझे सागर के किनारे तलहटी में छोड़ कर सागर की उच्छृंखल लहरों में लिप्त हो जाती हो मैं तट पर तुम्हारा अनवरत इंतजार करने को भी राजी हो जाता हूँ क्या यह भी पर्याप्त नहीं।
जब वर्षों इंतजार के बाद भी तुम्हारा कोई खबर नहीं मिलती तो मेरा टूट जाना स्वाभाविक है न और बस फिर उसी सागर में टूट टूट बिखर जाता हूँ फिर भी मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ न ही इसे तुम मेरी शिकायत समझना क्योंकि मैंने ही तेरी निर्झरता से प्रेम किया इसी में प्रकृति की भलाई थी यदि मैं अपने स्वार्थ के लिए तुम्हे बांध लेता तो तुम न सागर तक जा पाती न फिर घटाएँ चढ़ती और न फिर तुम जीवित होती बस तुम्हे हमेशा जीवित देखने की लालसा ही मुझे तुम्हारे अनवरत प्रवाह का प्रेमी बना देता है।
तुम जो जगत में जीवन का आधार हो मेरा स्वार्थ इस जगत के कल्याण से बड़ा नहीं आखिर तुम भी मुझसे प्रेम करती हो तभी तो सागर के तट में छोड़ जाने के बाद भी बार बार मुझे छुप छुप कर देखने आती हो मेरे प्रेम की सफलता तुम्हारे मार्ग के बंधन में नही बल्कि तुम्हारी निर्झरता और मेरे कटकर दफ्न हो जाने में है।
Nice
ReplyDeleteखूबसूरत कृति
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