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रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

अनुराग

प्रेम,प्यार,अनुराग न जाने और क्या क्या कहते हैं लोग इसे।भारतीय समाज में प्रेम का महत्व उतना ही प्राचीन है जितनी सभ्यता क्योंकि हमारे यहाँ सम्पूर्ण चर-अचर से संबंध का आधार या मूल तत्व प्रेम को माना गया है।आज के परिवेश में प्रेम को एक विकृति के रूप में प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया जा रहा है आज युवा धड़ल्ले से संबंध बना रहे हैं जिसे बढ़ते अपराध का कारण भी माना जा रहा है आज का यह लेख इसी भ्रांति को दूर कर प्रेम के सकारात्मक पहलू को प्रस्तुत करने का प्रयास मात्र है।

हमारे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में प्रेम के महत्व को रेखांकित किया गया है।महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग एवं सूफ़ीवाद का प्रमुख विषय ही प्रेम है इस प्रकार प्रेम ईश्वर से मिलने का मार्ग भी प्रशस्त करती है।मीरा को साक्षात कृष्ण के दर्शन अपने निष्काम प्रेम के बल पर ही प्राप्त हुआ था।वाल्मीकि हो या कालिदास स्त्री के प्रेम ने ही उन्हें इतिहास में अमर कर दिया।फिर तो हमारे यहाँ प्रेम करने वालों की फहरिश्त बड़ी लम्बी है हीर-रांझा हो या लैला-मजनूँ आज भी युवाओं की पहली पसंद है। भारतीय धर्म शास्त्र में भी पुरुषार्थ के चार प्रकार बताये गये हैं जिसमें 'काम'का आधार भी प्रेम है जो मोक्ष तक जाने का अनिवार्य चरण है। फिर अचानक प्यार में ये कैसी विसंगति आ गयी की लोग युवाओं को प्यार न करने की हिदायत देने लगे,विद्यार्थीयों से कहा जाने लगा की प्यार करने से भविष्य खराब हो जायेगा,ये प्यार करने की उम्र नही ,प्यार जिन्दगी खराब कर देता है और न जाने क्या क्या।क्या सच में प्यार जो दो दिलों को निस्स्वार्थ भाव से करीब लाता है ,एक दूसरे को समझने का यह प्रयास क्या सच में किसी को बर्बाद कर सकता है।मैं इस बात से कतई सहमत नही हो सकता तो फिर युवाओं की बर्बादी का कारण क्या है?मैंने इसकी खोज शुरू कर दी,और मैने पाया कि इसके मूल में कुछ और ही कारण छिपा हुआ है।
आजकी भागम-भाग जीवन शैली में माता-पिता अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते उनका जीवन अक्सर एकांकी हो जाता है जब वे बड़े होते हैं तो उस अकेलेपन को दूर करने के लिए दोस्त-यार में खो जाते हैं। समय और उम्र के प्रभाव से एक मन में आकर्षण पैदा होता है चूंकि वह व्यक्ति बचपन से ही संवेदनाओं से परे है वह व्यापारिक संबंधों से परिचित है सामाजिक संबंधों से नही और न ही आत्मीय संबंधों का ही कोई ज्ञान है ऐसे में जो वह संबंध बनाना चाहता है वह बाह्य है फलस्वरूप एक छल-छद्म प्रेम संबंध का उदय होता है जो बाहर से तो प्रेम जैसा ही लगता है किन्तु आंतरिक स्वरूप में प्रेम अनुपस्थित होता है।यही वह कारण है जो छद्म प्रेम और आत्मीय प्रेम में भ्रम उत्पन्न करता है और ये दुनिया इसे ही प्रेम समझ सच्चे प्रेमियों के लिए बाधक हो जाते हैं।
सच्चा प्रेम क्या है ये जानने से पहले ये भलीभांति समझ लें की प्रेम की व्यापकता क्या है? और इसे कैसे परिभाषित करें?वास्तव में प्रेम परिभाषा का विषय नही यह नितांत अनुभव का विषय है।  इसकी व्यापकता अंतरिक्ष के समान असीमित है यह नियंत्रण से भी परे है इसमें सम्पूर्ण चराचर संलग्न रहता है।भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षी,पर्वत-चट्टान ,बादल-झरना इत्यादि से मानव की गहरा संबंध है।
 प्रेम उसके आधार पर निर्भर करता है यदि प्रेम का आधार त्याग है तो वह कल्याणकारी व सदैव पुण्यफल दायी होगा किन्तु यदि प्रेम का आधार बाह्य आकर्षण,धन,पद या रूप-रंग है तो उस प्रेम की सफलता हमेशा संदिग्ध बनी रहेगी। जब व्यक्ति आकर्षण से किसी से जुड़ता है और जब वह उस आकर्षण का रसास्वादन कर तृप्त हो जाता है तो किसी अन्य आकर्षण में फंस जाता है और पुराने संबंधों को तोड़कर नये रिश्ते बनाने मे लग जाता है।
प्रेम तो ईश्वर साधना के समान है भला इससे किसी का क्या बुरा हो सकता है, बुराई का कारण तो हमारा संवेदनाहीन मनोरथ है जो हरपल पाने-खोने के कश्मकश में उलझा रहता है।प्रेम बड़ा ही हिम्मत का काज है जो त्यागी है वहीं सच्चा प्रेमी है क्योंकि वह अपने प्रिय के लिए अपनी पुरी दुनिया जहां कुरबान करने को तत्पर रहता है।वह जन्म जन्म तक अपने प्रिय के लिए इंतजार करने को तैयार रहता है।और यही कारण है कि प्रेम में इतनी शक्ति होती है कि ईश्वर भी इस प्रेम के सम्मुख झुक जाता है।
अतःन तो प्रेम कभी बुरा हो सकता है और न ही इसके परिणाम बुरे हो सकते हैं।हाल ही में UPSC TOPPER 'कनिष्क कटारिया ' ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के साथ अपने गर्लफ्रेंड को दिया।ऐसे ढेरों उदाहरण है जहाँ सच्चे प्रेम ने झूठा आकर्षण को आईना दिखाया है।अतः प्रेम को बढ़ती असमाजिकता का कारण ठहराना मानवीय अहंभाव का परिचायक है समाज अपनी गलतियों का ठिकरा मासूम प्रेमी जोड़ों पर उतार रहें जबकि वे अपने भले बुरे का बखूबी खयाल रखते हैं।इस प्रकार प्रेम पर बाधा डालना हमारे व्यस्ततम समाज के गलतियों पर पर्दा डालने के समान है। प्रेम का आज सामाजिक एकता के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है आज के प्रगतिशील युवा जात-पात की आडंबरों से उपर उठकर संबंधो को मजबूती दे रहे हैं और एक भेदभाव रहित समाज निर्माण में प्रत्यक्ष और क्रांतिकारी भुमिका निभा रहे हैं।यह प्रेम का ही प्रताप है।सच्चा प्रेम में कभी ब्रेकअप नही होता वहां केवल संयोग और वियोग होता है दोनो का परिणाम कल्याणकारी व सुखद होता है।संयोग तो आनंद देता ही है किन्तु वियोग जो प्रत्यय छोड़ जाता है वह भी हमारे यादों में एक अमूल्य अर्जित संपदा के रूप में शामिल हो जाता है आगामी पीढ़ी में संस्कारों का पर्याय बन जाता है।

Comments

  1. जय हो प्रभु 🙏इतना सुंदर प्रेम का वर्णन।अद्वितीय

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