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रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

मुक्तिमार्ग

 ॠषभ आज सुबह सुबह कुछ कराहते हुए नींद से जागा , आज उसकी तबियत में कुछ ज्यादा ही गिरावट आई थी।कुछ देर बिस्तर में पैर चप्पल में अंदर बाहर करते हुए सामने दीवार पर लगी पुराने फोटोग्राफ पर नजरें टिकाये हुए बैठा रहा,भावशून्य होकर एकटक निहारता रहा फिर कुछ हिम्मत जुटा कर खड़ा हुआ और बरामदे में आ गया,ड्योढ़ी से उतरकर आंगन में कुँए के पास जाकर आंख मुँह धोया और फिर अपने बिस्तर में लेट गया,दोनों हाथ एक के उपर एक अपने माथे पर रखकर किसी गहरी सोंच में डूब गया।ॠषभ एक होनहार अधेड़ उम्र का अविवाहित लड़का था हर प्रकार से अव्वल पर वक्त की ठगी ने उसे बिस्तर पर ला पटका था।कुछ दिन से उसे फेफड़ों से संबंधित समस्याएं आने लगी थी जांच से पता चला की उसे फेफड़ों का कैंसर है और वो भी अंतिम स्टेज में उसके पास गिनती के दिन शेष रह गये थे,माता पिता पहले ही अल्लाह को प्यारे हो चुके थे,चाचा ने पाल पोष कर बड़ा किया था, ॠषभ अपनी अंतिम दिनों में अपने चाचा के पास आ गया था जो भी समय बचा था उसे वे अपने गांव में गुजारना चाहता था।वो दिन भी बड़ा भयानक था, हर वक्त मौत का साया और जिंदगी का सरूर उसे बार बार अतीत के पन्ने में धकेल देता था वो कहिं खो जाता था और घंटो यादों के समंदर मे गोता लगाने के बाद जब होश में आता तो आंखों में सैलाब आ जाता था जी चाहता कि फूट-फूट कर रोए पर अब भी मन मसोस कर रह जाता था।

अजीत,ऋषभ का पक्का दोस्त था जब उसे ऋषभ के हालात का पता चला तो वो ऋषभ से मिलने उसके घर पहुँच गया उसने ऋषभ को एक नई उम्मीद बंधाने का प्रयास किया पर सारा यत्न बेकार गया,हाँ ऋषभ, अजीत के आने के बाद कुछ शांत जरूर हुआ था पर दिल में टीस अब भी थी जिसे अजीत ने पहचान लिया और ऋषभ को सब कुछ साफ साफ कहने के लिए विवश कर दिया ,ऋषभ ने दीवार पर टंगी कालेज की ब्लैक एंड व्हाइट ग्रुपफोटो की ओर इशारा करते हुए कहा- अजीत याद है तुम्हें वो फोटोग्राफ
अजीत ने लपकते हुए कहा -हाँ क्यों नही!ये तो हमारी क्लास की तस्वीर है।पर तुम ये मुझे क्यों दिखा रहे हो।
ऋषभ-तब तो तुम्हें ॠषिका भी याद होगी।
अजीत - हाँ!बिलकुल याद है आखिर हम सब एक ही ग्रुप के जो थे।
ऋषभ- अजीत जिंदगी में मैने सबकुछ पाया रूपया पैसा दौलत सोहरत सब कमाया पर बचपन में मां बाप को खो दिया कालेज में ऋषिका का साथ मिला तो लगा कि अब प्यार भी मिल जायेगा पर कभी उससे अपनी दिल की बात कह नही पाया और जीवन में प्यार से महरूम हो गया,एक किरण फूटी थी जिंदगी में पर वक्त में मुट्ठी बंद नही कर पाया और प्यार का परिंदा हमेशा के लिए मुझसे जुदा हो गया।मैं अब कुछ दिनों का मेहमान हूँ मूझे अब जिंदगी से कुछ नही चाहिए पर ईश्वर से मेरा इतनी शिकायत है कि उसने मेरे हिस्से की मोहब्बत मुझे क्यों अता नही की कहीं ये खालीपन मेरे मुक्तिमार्ग में बाधा तो नही बन जायेगा,इसलिए मैं एकबार ऋषिका से मिलना चाहता हूँ।
अजीत ने पुराने दोस्तों से संपर्क साधा और ऋषिका का पता लगाया,पता चला कि ऋषिका ने किसी IAS से शादी कर ली है और उनके दो बच्चे हैं,सुखी परिवार है।अजीत ने ऋषिका से सारी बात बता दी वो दुखी हुईं और ऋषभ से मिलने के लिए हामी भर दी दिन तय हो गया आने वाले रविवार को ऋषिका ऋषभ से मिलेंगीं इस प्रकार रविवार आने में तीन दिन की देरी थी पर ऋषभ का दिन ब दिन गिरता स्वास्थ्य चिंताजनक होती जा रही थी शनिवार को हालत एकदम बेहोशी में पहुंच चुका था रह रह कर आंखों में अंधेरा छा रहा था , अजीत,ऋषभ के आंखों में जिंदगी का जंग हारते हुए साफ देख रहा था पर उसके हाथ में कुछ भी न था उसने आनन-फानन में ऋषिका का फोन मिलाया पर उससे बात नही हो पायी। फोन नौकर ने उठाया उसने बताया की मेमसाहिबा अपने किसी मित्र से मिलने आउट आफ स्टेशन गयी हुई हैं और उन्हें लौटने में कुछ दिन लग जायेंगे बात अभी पुरी भी नही हुई थी की दरवाजे की घंटी बजी सामने ऋषिका थी उसने अजीत को बताया कि रात से ही वो कुछ अच्छा महशूश नहीं कर रहीं है उन्हें ऐसा लग रहा था मानों कोई खींच रहा हो और अचानक वो सुबह सुबह ही यहाँ के लिए निकल पड़ी।उसने शीघ्र ही ऋषभ से मिलने की इच्छा जाहिर की।
ऋषभ की प्राण मानो ऋषिका के लिए ही अटकी हुई थी,ऋषभ के हालत को देखकर ऋषिका अपने आंसू रोक नही पायी ऋषभ के सर को अपने गोद में भरकर जार जार रोने लगी ऋषिका के आंसू मानो ऋषभ से शिकायत कर रही थी कि इतने दिनों तक उसे याद क्यों नही किया,क्यों उसे छोड़ दिया,क्यों उसने ऋषिका के विश्वास को प्यार का संबल नही दिया।असहनीय दर्द को भूल चुका ऋषभ,ऋषिका के नयनों से फूटी ज्वार में कहीं दूरा बह चुका था,ऋषिका के कांधे पर कसी बांह ढीली पड़ चुकी थी,आंखो की नूर उतर आयी थी, शरीर शिथिल हो चुका था।ऋषभ ने अपने जीवन की अंतिम बाजी जीत लिया था ,ऋषभ प्रेम के गहराई में डूब कर आसमानी हो गया था उसके पोर पोर से शांति की रोमांचक धारा फूट रही थी,उसने जीवन को अलविदा कह दियाा था!

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