INDIA

रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

दिया अमावश का

 अतीत तब और भारी हो जाता है जब वर्तमान पर अमावश गहराती है।जीवन को लेकर हमारी संकीर्णता हमे हमारे ही बनाये भ्रमजाल में फंसा देती है।एक क्षण रूककर सोंचिये कि हम सब इस वक्त जो कुछ कर रहे हैं उसका सारा दारोमदार भविष्य के उज्जवलता की चाहत है पर कोई नही कहता कि वो दिन कब आयेगा,आज भी तो किसी कल का ही परिणाम है किसी बीते हुए कल की भविष्य है तो फिर आज हम खुश क्यों नही हैं ?आखिर ये आज भी तो कल के भविष्य को सुधारने के प्रकल्प से ही उत्पन्न हुआ है पर जीवन में सुख का एक तिनका भी दिखाई नही पड़ता,दूर दूर तक अंधेरा ही अंंधेरा है रोशनी का एक किरण तक नही दिखता इस गहरे श्याह की अंत भी नजर नही आती मानो अब शुक्ल भी अमावश में उतर आयी है कभी कभी यह भी लगता है कि आत्मा का टिमटिमाता दिया इसी अमावश में झोंक दूं और अंत कर दूँ रोशनी की तलाश, तिरोहित कर दूँ अपने अस्तित्व की परछाई को और मिटा दूं जीवन के सारे सबूत, जो शाश्वत था है और रहेगा वो अंधकार था भला इसे कोई कैसे मिटा सकता है? क्या कभी मिटा है? जवाब है नही! तो क्या मानव जाति की संपूर्ण आस्था और उसकी मान्यताएं तथा उसके ईश्वरीय आलोक सब झूठे है? या तो यही सत्य हो या फिर स्वयं परमात्मा ही अंधकारमय हो!और यदि परमात्मा ही अंधकारमय है तब हम किस रोशनी की तलाश कर रहें हैं?क्या हमारी खोज कभी पूर्णता को प्राप्त होगी या अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा?

बुद्ध ने कौन से रोशनी खोजी थी?क्या वे आभावान थे?क्या सच में उनके पास ऐसा कोई दिया था जो उन्हें राह दिखाती थी जो सच में अंधकार को हर लेता था? विद्वानों का मानना है कि अंधकार का अस्तित्व कुछ न होने पर है अर्थात जब रोशनी न हो तो उसे अंधकार कहते हैं ध्यान रहे अंधकार पैदा नही होता यद्यपि वह आभाव का परिणाम है अतः उसकी समाप्ति का प्रयास भी ब्यर्थ है जैसे पानी में तलवार चलाना,परछाई को काट डालना इसलिए अंधकार तो समाप्त नही हो सकता है पर उसे भरा जा सकता है जैसे दिया भर देता है अंधेरे को पर इसका अर्थ अंधेरा का समापन नही है जैसे धरती हवा से भर गया इसका अर्थ यह नही की धरती का अस्तित्व मिट गया।इस प्रकार बुद्ध ने स्वयं के खालीपन को भरकर अपनी रोशनी पायी थी न कि अंधकार को मिटाने का दंभ भरा था।पर हमारा जीवन अंधकार से लड़ने में ही व्यर्थ हो जाती है।अंधकार के सनातनी शाश्वतता को स्वीकार कर स्वयं को भरने का प्रयास करें सहज भाव से अपनी अंतरात्मा के खालीपन को भरें और देखें कि जीवन चमत्कारों से भर जायेगा साक्षी बनेें और स्वीकार करें।

ओशो के अमृत बचन जो मैनें सीखा आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ।

Comments

  1. मेरे अंतर्मन को छूने वाला लेख 💘💘

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