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रज़ा

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  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो तेरी हर रज़ा में भी मेरी मजा हो  तुझसे अलग जी न चलता जहां का  हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो।। तुझसे है सूरज ये चांदनी तुझसे तुझसे जहां है ये रागिनी तुझसे तुझसे महकती फिज़ा इस जहां की सारे जहां की तुम्ही एक वजह हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो  तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।। मेरे मौला मैं तो हूं आशिक तेरा ही गले से लगा ले या दूरी बना ले  मैं होके फ़ना हो जाऊं जहां की रहम के बिना तेरे जीना कज़ा हो हँस के भी सह लेंगे कोई सजा हो तू रख ले मुझे जैसे तेरी रज़ा हो।।                        🎉DC✨️✨️✨️                                    🍓🍍🍍👍👍

मानवीय संवेदना का छिछलापन


"वन नष्ट होते हैं तो जल नष्ट होती है, पशु नष्ट होते हैं तो उर्वरता विदा लेती है और तब यह पुराने प्रेत एक के पीछे एक प्रकट होने लगता है- बाढ़, सूखा ,आग ,अकाल और महामारी।"  उक्त वचन स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक रॉबर्ट चेंबर्स की है। आज धरती की हालत का यथार्थ बोध दशकों पुरानी कथन से हो रही है ऐसे में इस कथन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह  थोथी शब्दजाल नही है अपितु चेम्बर्स की प्रकृति के प्रति अनन्य प्रेम और उससे उपजे प्रगाढ़ संबंधों की अभिव्यक्ति भी है तभी उन्होंने धरती की वेदना को पहचानने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है । 
आज का मानव औद्योगिक समाज का आर्थिक मानव है वह लाभ हानि के भयंकर ऊहापोह से ग्रस्त है संबंधों में भी लाभ हानि का प्रतिशत देखता है ऐसे में मानवीय संवेदना का क्या काम है मगर हमारे चारों ओर कई ऐसी घटनाएं कभी-कभी घट जाती हैं और मानव संवेदना का ज्वार फूट पड़ता है क्योंकि हैं तो हम इंसान ही! लगता है संवेदना से भरा इंसान अब रुकेगा नहीं वह दुनिया उलट-पुलट कर देगा परंतु संवेदना का ज्वार शांत होते ही वह स्वयं उलट-पुलट जाता है। संवेदना के आवेश में ना जाने क्या करता पर शांत होते ही वह पुनः सामान्य हो जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 
मुझे आश्चर्य तब होती है जब मैं अचानक भूकंप की तरह फटने वाली इन संवेदनाओं के कारणों पर नजर दौड़ाता हूं और तब यह लगता है कि मनुष्य का संवेदना कितना सतही और कितना छिछला है। हाल ही में केरल से लगातार तीन दिन में 3 खबरें आई प्रथम एक स्कूल छात्रा को उसके परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने के लिए 70 सीटर बोट चलाया गया, द्वितीय एक गरीब की लड़की ने इसलिए आत्मदाह कर लिया क्योंकि उसके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल नहीं थी, तृतीय यह एक गर्भवती हथिनी को बारूद भरे फल खिलाने से हुई विस्फोट और उसके बाद हथिनी की दर्दनाक मौत की थी प्रथम खबर कुछ बड़ा चर्चा बनने से रह गया पर जितना चर्चा हुआ उसमें सरकार और प्रशासन की वाहवाही हुई और होनी भी चाहिए। आखिर शिक्षा को इतना महत्व दिया जा रहा है पर वही दूसरी खबर शिक्षा के प्रति समर्पण की पोल खोलती नजर आई जहां एक छात्रा ने आत्मदाह कर लिया है अब बारी तीसरी खबर की थी जिसे 'मानवता की मौत' तक कहा गया पूरा दिन यह चर्चा और लानत-मलामत का कारण बना मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया में यह मुद्दा छाया रहा देखते ही देखते देश की कई बड़ी हस्तियां नेता ,अभिनेता , समाजसेवी, पर्यावरणविद् सभी इस मुद्दे के समर्थन में उतर आए थे यहां तक कि केंद्रीय वन मंत्री को कठोर कदम उठाने का आश्वासन भी देना पड़ गया और होना भी चाहिए पशु क्रूरता कानून के तहत जो उचित हो वह एक्शन अविलंब लिया जाना चाहिए आज के समाज में हथिनी के लिए ऐसा संवेदना देख कर भला कोई प्रभावित क्यों ना हो पर जब आप अपने चारों ओर नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि कितने लोग रोज मानवीय संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं कितने मजदूर सरकारी उपेक्षा के शिकार होकर सड़कों पर बेमौत मर रहे हैं, कितने बच्चे यतीम हो गए, कितनों ने अपना एकमात्र सहारा खोया तब हमारा यह संवेदना कहां मर जाता है जब बात एक व्यक्ति के साथ न्याय की होती है तब यह संवेदना कहां गायब हो जाते हैं, जिनके मुंह से एक शब्द मजदूरों के लिए संवेदना कि नहीं फूटी वे लोग भी हथिनी के मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने आ गए, तो क्या! हथनी की मौत पर टेसुए लाल करने वाली जमात की संवेदना को सच्चा कह सकते हैं ,क्या उनकी संवेदना कफन खींचते बच्चे की तस्वीर से नहीं जागती ,सड़कों पर मीलों पैदल चलते मजदूरों की लाचारी से संवेदना नहीं जागती। मानव अधिकार आयोग ,सुप्रीम कोर्ट ,सरकार, मजदूर संघ किसी का भी कुंभकरणीय नींद में व्यवधान नहीं पड़ा आखिर इनके आंखों में नींद कहां से आई होगी ऐसे में क्या यह संवेदना वास्तविक मान लिए जाएंगे? सच तो यह है कि यह उधारी की संवेदना है मीडिया की बनाई गई ओछी संवेदना! जिसने हथिनी की मौत पर हमें रोना तो सीखा दिया पर मजदूरों के मौत पर पर्दा डाल दिया और उनके प्रति संवेदना को लील गया। उसने इंसानों की मौत को जानवर की मौत से भी बदतर बना दिया और हमे संवेदनहीन। 
अब हम इंसानों से नहीं जानवरों से अधिक संवेदना रखते हैं मेरा विरोध हथिनी से संवेदना रखने वालों से नहीं है ।मेरा विरोध संवेदना के धंधे करने वाले मीडिया से है जिसको आज हमने अपने समस्त बौद्धिक और भावनात्मक पहलुओं का चाबी सौंप रखा है कि वह जब चाहे हमें जैसा चाहे वैसा भावनाओं में बांध सके वरना ऐसे कितने खबरें हमारे आस-पास हैं।रोज मानवता शर्मशार हो रही है आखिर कब तक हम सत्ता,नेता या पार्टी का चाटूकारिता करते रहेंगे।क्या कभी हम नागरिक भी बन पायेंगे?क्या कभी हम नेता और देश का चुनाव में देश कु चुन पायेंगे?क्या हम अपनी वोट से चुने सरकारों को सवाल कर पायेंगे?क्या हम लोकतंत्र के खूबसूरती को यूँ ही लूट जाने दें? 
  • जय हिंद!

Comments

  1. अतिसुन्दर लेख चन्द्रा भाई

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  2. क्या कहे भाई देश में संवेदना,जागृति तभी आयेगी जब देशरूपी इस इमारत की कंगुरो को क्षति पहुँचेगी या तो उसमे दरार पड़ेगी या फिर उसकी पपड़ियां उधड़ेगी ।नींव की फिक्र किसे है साहब 😔😔

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